Saturday, 3 September 2016

Sucessful Person



कैसे बन सकते है Sucessful Person
दोस्तों, आज के समय में एक Sucessful Person होना भी स्वयं में एक बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती है | Sucessful Person बनना आसान नहीं होता है उसके लिए हमें कड़ी मेहनत करनी होती है | तब जाकर हमें सफलता की प्राप्ति होती है | हर इंसान Sucessful Person बनना चाहता है।
सही रूप में सफलता का अर्थ है कि दुनिया की भीड़ से हटकर कुछ अलग करना और अपनी एक विशेष पहचान को दुनिया में स्थापित करना | यह एक Sucessful Person की पहचान होती है |
आज इस आर्टिकल की मदद से हम आपको एक Sucessful Person कैसे बना जाये ?’ इस उलझन को सुलझाने के लिए आपको यहाँ पर कुछ महत्वपूर्ण बातों से आपको अवगत कराया जायेगा , जिससे आपको Sucessful Person बनने में कामयाबी मिलेगी | Sucessful Person बनने हेतु महत्वपूर्ण बातें कुछ इस प्रकार है |
Sucessful Person बनने के लिए जानिए ये बातें
लक्ष्य पर फोकस
Sucessful Person बनने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है किसी भी एक लक्ष्य को अपने जीवन का उद्देश्य बना लेना। वह लक्ष्य कुछ भी हो सकता है और असके लिए आप सब कुछ भुलाकर आपको बस अपने लक्ष्य पर फोकस करना होगा। जब तक आपको सफलता की प्राप्ति हो जाये , तब तक आप सब कुछ भुलाकर अपने लक्ष्य को बस ध्यान में रखें और लक्ष्य प्राप्ति हेतु निरंतर कड़ी मेहनत करते रहें | इस तरह से आप एक Sucessful Person बनने में कामयाबी हासिल कर सकेंगे | इसलिए एक Sucessful Person के लिए लक्ष्य पर फोकस बहुत ही महत्वपूर्ण है |
आत्मविश्वास है जरूरी
किसी भी Sucessful Person के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है आत्मविश्वास | जिस व्यक्ति के अंदर आत्म विश्वास की कमी होगी वह एक Sucessful Person कभी भी नहीं बन सकता है | इस लिए Sucessful Person होने के लिए अपने अंदर कैसी भी परिस्थिति में आत्मविश्वास की कभी भी कमी महसूस होने दें | अपने अंदर दृढ़ विश्वास रखें कि आप अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में जरूर कामयाब होंगे |
नकारात्मक विचार लाएं
यदि आपने खुद को समाज में साबित करने विचार बना ही लिया है तो उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि अपने अंदर कभी नकारात्मक विचारों को मन में आने दें, सदैव सकारात्मक सोच रखें | आपने  लक्ष्य की प्राप्ति हेतु सदैव सकारात्मक रहें | मन में यह ठान लें कि आपसे बेहतर इस कार्य को कोई भी नहीं कर सकता है | इस तरह से सकारात्मक सोच एक Sucessful Person बनने के संकेत देती है |
शांति है जरूरी
यहाँ पर शांति का अर्थ है कि कभी किसी विपदा या विपरीत परिस्थितियों में फंस जाना जहां आपको अपनी सूझ बूझ से काम करना होता है। ऐसे स्थानों पर उत्तेजित होकर कार्य नहीं करना चाहिए। समाज समय समय पर आपकी परीक्षा लेता है आपको यह ध्यान में रखना होता है कि आप इस मौके पर कैसे अपने आपको साबित करने में कामयाब होंगे | इस लिए एक सफल व्यक्ति के लिए शांत स्वभाव का होना अति आवश्यक होता है |
आपने टैलेंट को पहचाने
Sucessful Person बनने के लिए यदि आपने अपने टैलेंट को पाचन लिए है तो आपको सफलता प्राप्ति में ज्यादा अधिक वक्त नहीं लगेगा और आप अपने टैलेंट के बल पर सफलता की ओर तीव्र गति से बढ़ते जायेंगे | आपके टैलेंट के द्वारा किया गया प्रयास सही दिशा में होगा | इसलिए एक Sucessful Person बनने के लिए आपने अंदर के टैलेंट को पहचानना बहुत लाभदायक होता है |
निर्णय लेने की क्षमता
एक Sucessful Person बनने वाले व्यक्ति के अंदर निर्णय लेने की क्षमता का होना बहुत आवश्यक होता है | यदि आपमें सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता नहीं है तो आप कभी भी सफलता नहीं प्राप्त कर सकते है |
आशावादी रहें
किसी भी परिस्थिति में आप आप निराश हो , आपने लक्ष्य को याद रखें | परिणाम कुछ भी हो ,सदैव आशावादी रहें | यदि हम आशावादी रहते है तो हमारे अंदर कार्य पूर्ण होने की एक उम्मीद बनी रहती है इसलिए एक Sucessful Person के लिए आशावादी होना भी आवश्यक होता है |

ज्ञानभी है जरूरी
कोई भी सफलता पाने के लिए ज्ञान का होना भी बहुत आवश्यक होता है | आपने लक्ष्य के साथ साथ सभी क्षेत्रों से ज्ञान का भी भंडारण करना आवश्यक होता है | इसलिए जहाँ तक संभव हो सकें , सभी क्षेत्रों से ज्ञान लेने का प्रयास करते रहें | इसके लिए हमें टेलीविज़न न्यूज़, दैनिक समाचार और इंटरनेट का भी प्रयोग हमारे लिए लाभकारी सिद्ध होगा |

Satyarthparkash

                                                            सत्यार्थप्रकाश
जैसी यह पृथिवी जड़ है, वैसे ही सूर्यादि लोक हैं। वे ताप और प्रकाषादि से भिन्न कुछ भी नहीं कर सकते। क्या ये चेतन हैं, जो क्रोधित होके दुःख और शान्त होके सुख दे सकें?
प्रष्न- क्या जो यह संसार में राजा-प्रजा-दुःखी हो रहे हैं, यह ग्रहों का फल नहीं है?
उत्तर- नहीं, ये सब पाप-पुण्यों के फल हैं।
प्रष्न-तो क्या ज्योतिष शास्त्र झूठा है?
उत्तर-नहीं, जो उसमें अड़क बीज, रेखागणित विद्या है, वह सब सच्ची, जो फल की लीला है, वह सब झूठी है।
प्रष्न- क्या जो यह जन्मपत्र है, सो निष्फल है?
उत्तर-हाँ, वह जन्मपत्र नहीं, किन्तु उसका नाम ‘शोकपत्र’ रखना चाहिए। क्योंकि जब सन्तान का जन्म होता है, तब सबको आनन्द होता है। परन्तु तब तक होता है कि जब तक जन्मपत्र बनके ग्रहों का फल न सुने। जब पुरोहित जन्मपत्र बनाने को कहता है तब उसके माता-पिता पुरोहित से कहते हैं ‘‘महाराज! टाप बहुत अच्छा जन्मपत्र बनाइए’’जो धनाढच हो तो बहुत सी लाल-पीली रेखाओं से चित्र-विचित्र और निर्धन हो तो साधारण रीति से जन्मपत्र बनाके सुनाने को आता है। तब उसके मा-बाप ज्योतिषीजी के सामने बैठके कहते हैं ‘‘इसका जन्मपत्र अच्छा तो है?’’ ज्योतिषी कहता है ‘‘जो है सो सुना  देता हूँ, इसके जन्मग्रह बहुत अच्छे और मित्रग्रह भी अच्छे हैं, जिनका फल धनाढच और प्रतिष्ठावान् जिस सभा में जा बैठेगा, तो सबके ऊपर इसका तेज पड़ेगा, शरीर से आरोग्य और राज्यमान भी होगा।’’ इत्यादि बातें सुनके पिता आदि बोलते हैं ‘‘वाह-वाह ज्योतिषीजी! आप बहुत अच्छे हो।’’ ज्योतिषीजी समझते हैं इन बातों से कार्य सिद्ध नहीं होता, तब ज्योतिषी बोलता है कि ‘‘ये ग्रह तो बहुत अच्छे हैं, परन्तु ये ग्रह क्रूर हैं अर्थात् फलाने-फलाने ग्रह के योग से ८ वें वर्ष में इसका मृत्युयोग है।’’ इसको सुन के माता-पितादि पुत्र के जन्म के आनन्द को छोड़के शोकसागर में डूबकर, ज्योतिषीजी से कहते हैं कि ‘‘महाराजजी! अब हम क्या करें?’’ तब ज्योतिषीजी कहते हैं ‘‘ उपाय करो।’’ गृहस्थ पूछे’’ क्या उपाय करें?’’ ज्योतिषीजी कहते हैं कि ‘‘ऐसा-ऐसा दान करो, ग्रह के मन्त्र का जप कराओ और नित्य ब्राह्यणों को भोजन कराओगे, तो अनुमान है कि नवग्रहों के विघ्र हट जाएँ।’’ अनुमान शब्द इसलिए है कि जो मर जाएगा तो कहेंगे, हम क्या करें, परमेश्वर के ऊपर कोई नहीं है, हमने तो बहुत सा यत्न किया और तुमने कराया, उसके कर्म ऐसे ही थे। और जो बच जाए तो कहते हैं कि देखो-हमारे मन्त्र, देवता और ब्राह्यणों की कैसी शक्ति है! तुम्हारे लड़के को बचा दिया।
    यहाँ यह बात होनी चाहिए कि जो इनके जप, पाठ से कुछ न हो तो दूने-तिगुणे रूपये उन धूत्र्तो से ले-लेने चाहिएँ और बच जाए तो भी ले-लेने चाहियें, क्योंकि जैसे ज्योतिषियों ने कहा कि ‘‘इसके कर्म और परमेश्वर के नियम तोड़ने का सामथ्र्य किसी का नहीं’’, वैसे गृहस्थ भी कहें कि ‘‘ यह अपने कर्म और परमेष्वर के नियम से बचा है, तुम्हारे करने से नहीं’’।
    जो माता, पिता और आचार्य सन्तान और षिष्यों का ताडन करते हैं, वे जानों अपने सन्तान और शिष्यों को अपने हाथ से अमृत पिला रहे हैं, और जो सन्तानों वा षिष्यों का लाडन करते हैं, वे अपने सन्तानों और षिष्यों को विष पिला के नष्ट-भ्रष्ट कर देते हैंै। क्योंकि लाडन से सन्तान और शिष्य दोषयुक्त तथा ताडना से गुणयुक्त होते हैं। और सन्तान और शिष्य लोग भी ताडना से प्रसन्न और लाडन से अप्रसन्न सदा रहा करें। परन्तु माता-पिता तथा अध्यापक लोग ईष्र्या, द्वेष से ताडन न करें, किन्तु ऊपर से भयप्रदान और भीतर से कृपादृष्टि रक्खें।
अथ तृतीयसमुल्लासारम्भः
अथाऽध्ययनाऽध्यापनविधिं व्याख्यास्यामः।।
    आठ वर्ष के हों तभी, लड़कों की और लड़कियों को लड़कियों की शाला में भेज देवें। जो अध्यापक पुरूष वा स्त्री दुष्टाचारी हों, उनसे शिक्षा न दिलावें, किन्तु जो पूर्ण विद्यायुक्त धार्मिक हों, वे ही पढ़ाने और शिक्षा देने योग्य हैं। द्विज अपने घर में लड़कों का यज्ञोपवीत और कन्याओं का भी यथायोग्य संस्कार करके, यथोक्त आचाय्र्यकुल अर्थात् अपनी-अपनी पाठशाला में भेद दें। विद्या पढ़ने का स्थान एकान्त देष में होना चाहिए और वे लड़के और लड़कियों की पाठशाला दो कोश एक -दूसरे से दूर होनी चाहिएँ। जो वहाँ अध्यापिका और अध्यापक पुरूष वा नौकर-चाकर हों वे कन्याओं की पाठषाला में सब स्त्री और पुरूषों की पाठशाला में पुरूष रहें। स्त्रियों की पाठशाला में पाँच वर्ष का लड़का और लड़कों की पाठषाला में पाँच वर्ष की लड़की भी न जाने पावे अर्थात् जब तक वे ब्रह्यचारी व ब्रह्यचारिणी रहें, तब तक स्त्री वा पुरूष का दर्शन, स्पर्शन, एकान्तसेवन, भाषण, विषयकथा, परस्परक्रीडा, विषय का ध्यान और सड़ग इन आठ प्रकार के मैथुनों से अलग रहें। और अध्यापक लोग उनको इन बातों से बचावें, जिससे उत्तम विद्या, शील स्वभाव, शरीर और आत्मा के बलयुक्त हो के, आनन्द को नित्य बढ़ा सकें।
    आठवें वर्ष से आगे अपने लड़के, लड़कियों को घर में न रखके, पाठषाला में अवश्य भेज देवें। जोन न भेजे, वह दण्डनीय हो। प्रथम लड़कों का यज्ञोपवीत घर में हो और दूसरा पाठषाला में आचाय्र्यकुल में हो। पिता, माता वा अध्यापक अपने लड़का-लड़कियों को अर्थसहित गायत्रीमन्त्र का उपदेश कर दें।
    जल से शरीर के बाहर के अवयव, सत्याचरण से मन, विद्या और तप अर्थात् सब प्रकार के कष्ट भी सह के, धर्म ही के अनुष्ठान करने से जीवात्मा, ज्ञान, अर्थात् पृथिवी से लेके परमेश्वर पर्यन्त पदार्थो के विवेक से बुद्धि, अर्थात् दृढ़निष्चय पवित्र होता है। इससे स्त्रान भोजन के पूर्व अवष्य करना चाहिये।
दूसरा प्राणाम, इसमें प्रणाम-
प्राणायामादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।
    जब मनुष्य प्राणायाम करता है तब प्रतिक्षण उत्तरोत्तर काल में अशुद्धि का नाश और ज्ञान का प्रकाश होता जाता है। जब तक मुक्ति न हो तब तक उसके आत्मा का ज्ञान बराबर बढ़ता जाता है।
प्रष्न-होम से क्या उपकार होता है?
उत्तर-सब लोग जानते हैं कि दुर्गन्धयुक्त वायु और जल से रोग, रोग से प्राणियों को दुःख, और सुगन्धित वायु तथा जल से आरोग्य, और रोग के नष्ट होने से सुख प्राप्त होता है।
प्रष्न-चन्दनादि घिस के किसी को लगावे, वा घृतादि खाने को देवे तो बड़ा उपकार हो। अग्रि में डाल के व्यर्थ नष्ट करना, बुद्धिमानों का काम नहीं।
उत्तर-जो तुम पदार्थविद्या जानते, तो कभी ऐसी बात न कहते। क्योंकि किसी द्रव्य का अभाव नहीं होता। देखो! ज्हाँ होम होता है, वहाँ से दूर देष में स्थित पुरूष के नासिका से सुगन्ध का ग्रहण होता है, वैसे दुर्गन्ध का भी। इतने ही से समझ लो कि अग्रि में डाला हुआ पदार्थ सूक्ष्म होके फैल के, वायु के साथ दूर देष में जाकर, दुर्गन्ध की निवृत्ति करता है।
प्रष्न- जब ऐसा ही है तो केषर, कस्तूरी, सुगन्धित पुष्प् और अतर आदि के घर में रखने से सुगन्धित वायु होकर सुखकारक होगा।
उत्तर-उस सुगन्ध का वह सामथ्र्य नहीं है कि गृहस्थ वायु को बाहर निकालकर, शुद्ध वायु को प्रवेश करा सके, क्योंकि उसमें भेदक-शक्ति नहीं है। और अग्रि ही का सामथ्र्य है कि उस वायु और दुर्गन्धयुक्त पदार्थो को छिन्न-भिन्न और हल्का करके, बाहर निकाल कर, पवित्र वायु को प्रवेष करा देता है।
प्रष्न-तो मन्त्र पढ़ के होम करने का क्या प्रयोजन है?
उत्तर-मन्त्रों में वह व्याख्यान है कि जिससे होम करने के लाभ विदित हो जायें और मन्त्रों की आवृत्ति होने से कण्ठस्थ रहें। वेदपुस्तकों का पठन-पाठन और रक्षा भी होवे।
प्रष्न-क्या इस होम करने के विना पाप होता है?
उत्तर-हाँ! क्योंकि जिस मनुष्य के शरीर से जितना दुर्गन्ध उत्पन्न हो के वायु और जल को बिगाड़ कर, रोगोत्पत्ति का निमित्त होने से, प्राणियों को दुःख प्राप्त कराता है, उतना ही पाप उसी मनुष्य को होता है। इसलिए उस पाप के निवारणार्थ, उतना सुगन्ध वा उससे अधिक, वायु वा जल में फैलाना चाहिए। और खिलाने-पिलाने से उसी एक व्यक्ति को सुखविशेष होता है। जितना घृत और सुगन्धादि पदार्थ एक मनुष्य खाता है, उतने द्रव्य के होम से लाखों मनुष्यों का उपकार होता है। परन्तु जो मनुष्य लोग घृतादि उत्तम पदार्थ न खावें, तो उनके शरीर और आत्मा के बल की उन्नति न हो सके। इससे अच्छे पदार्थ खिलाना-पिलाना भी चाहिए, परन्तु उससे होम अधिक करना उचित है, इसलिए होम का करना अत्यावष्यक है।
    कामात्मता......वैदिकः।
    अत्यन्त कामातुरता और निष्कामता किसी के लिए भी श्रेष्ठ नहीं, क्योंकि जो कामना न करे तो वेदों का ज्ञान और वेदविहित कर्मादि उत्तम कर्म किसी से न हो सकें।
                                        -मनुस्मृति
   
    इन्द्रियाणां......वाजिनाम्।
    जैसे विद्वान् सारथि घोड़ों को नियम में रखता है, वैसे मन और आत्मा को खोटे कामों में खैंचनेवाले विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों के निग्रह में प्रयत्न सब प्रकार से करे।
-मनु0
    इन्द्रियाणां........नियच्छति।
    जीवात्मा इन्द्रियों के वश होके निष्चित बड़े-बड़े दोषों को प्राप्त है, और जब इन्द्रियों को अपने वश में करता है, तभी सिद्वि को प्राप्त होता है।
    अभिवादनशीलस्य.......बलम्।
    जो सदा नम्र, सुशील, विद्वान् और वृद्धों की सेवा करता है, उसका आयु, विद्या, कीर्ति और बल, ये चार सदा बढ़ते रहते हैं। और जो ऐसा नहीं करते, उनके आयु आदि चार नहीं बढ़ते।
-मनु0
    अहिंसयैव.......धर्ममिच्छता।
    यस्य......फलम्।
    विद्वान् और विद्यार्थियों को योग्य है कि वैरबुद्धि छोड़ के सब मनुष्यों को कल्याण के मार्ग का उपदेश करें, और उपदेष्टा सदा मधुर, सुषीलतायुक्त वाणी बोले। जो धर्म की उन्नति चाहै, वह सदा सत्य में चले और सत्य ही का उपदेष करे।।
    जिस मनुष्य के वाणी और मन शुद्ध तथा सुरक्षित सदा रहते हैं, वही सब वेदान्त -सब वेदों के सिद्धान्तरूप फल को प्राप्त होता है।
        -मुन0
    जो पुरूष (अर्थ) सुवर्णादि रत्न और (काम) स्त्रीसेवनादि में नहीं फसे हैं, उन्हीं को धर्म का ज्ञान प्राप्त होता है। जो धर्म के ज्ञान की इच्छा करें, वे वेद द्वारा धर्म का निष्चय करें, क्योंकि धर्माऽधर्म का निष्चय विना वेद के ठीक-ठीक नहीं होता।
    अब जो-जो पढ़ना-पढाना हो वह-वह अच्छी प्रकार परीक्षा करके होना योग्य है। परीक्षा पाँच प्रकार से होती है-
एक- जो-जो ईष्वर के गुण, कर्म, स्वभाव और वेदों से अनुकूल हो, वह-वह ‘सत्य’ और उससे विरूद्ध ‘असत्य’ है।
दूसरी-जो-जो सृष्टिक्रम से अनुकूल वह-वह ‘सत्य’ और जो-जो विरूद्ध है, वह सब ‘असत्य’ है। जो कोई कहे- ‘‘विना माता-पिता के योग से लड़का उत्पन्न हुआ’’, वह सृष्टिक्रम से विरूद्ध होने से असत्य है।
तीसरी-‘‘आप्त’’ अर्थात् जो धार्मिक, विद्वान, सत्यवादी, निष्कपटियों का संग, उपदेष के अनुकूल है, वह-वह ‘ग्राह्य’ और जो-जो विरूद्ध है, वह-वह ‘अग्राह्य’ है।
चैथी-अपने आत्मा की पवित्रता, विद्या के अनुकूल, अर्थात् जैसा अपने को सुख प्रिय और दुःख अप्रिय है, वैसे सर्वत्र समझ लेना कि मैं भी किसी को दुःख वा सुख दूँगा, तो वह भी अप्रसन्न और प्रसन्न होगा।
    और पाँचवीं-आठों प्रमाण अर्थात् प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव।
इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं.......प्रत्यक्षम्।
    जो श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्ना और घ्राण का शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध के साथ अव्यवहित अर्थात् आवरणरहित सम्बन्ध होता है, इन्द्रियों के साथ मन का और मन के साथ आत्मा के संयोग से ज्ञान उत्पन्न होता है, उसको ‘प्रत्यक्ष’ कहते हैं।
    जब तक एक निष्चय न हो, तब तक वह प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं है। किन्तु जो अव्यपदेष्य, अव्यभिचारि और निष्चयात्मक ज्ञान है, उसी को ‘प्रत्यक्ष’ कहते हैं।
अथ......पूर्ववच्छेषवत्सामान्यतोदृष्टञच।
    जो प्रत्यक्षपूर्वक अर्थात् जिसका कोई एक देष वा सम्पूर्ण द्रव्य किसी स्थान वा काल में प्रत्यक्ष हुआ हो, उसका दूर देष से सहचारी एक देष के प्रत्यक्ष होने से अदृष्ट अवयवी का ज्ञान होने को ‘अनुमान’ कहते हैं। जैसे पुत्र को देख के पिता, पर्वतादि में धूम को देख के अग्रि, जगत् में सुख दुःख देख के पूर्वजन्म का ज्ञान होता है।
प्रसिद्धसाधम्र्यात्साध्यसाधनमुपमानम्।।
    जो प्रसिद्ध प्रत्यक्ष साधम्र्य से साध्य अर्थात् सिद्ध करने योग्य ज्ञान की सिद्धि करने का साधन हो, उसको ’उपमान’ कहते हैं। ‘उपमीयते येन तदुपमानम्’ जैसे किसी ने किसी भृत्य से कहा कि ‘‘तू देवदत्त के सदृष विष्णुमित्र को बुला ला’ वह बोला कि ‘‘मैने उसको कभी नहीं देखा’’। उसके स्वामी ने उससे कहा कि ‘‘जैसा यह देवदत्त है, वैसा ही विष्णुमित्र है,’’
आप्तोपदेषः शब्दः।
जो आप्त अर्थात् पूर्ण विद्वान, धर्मात्मा, परोपकारप्रिय, सत्यवादी, पुरूषार्थी, जितेन्द्रिय पुरूष जैसा अपने आत्मा में जानता हो और जिससे सुख पाया हो, उसी के कथन की इच्छा से प्रेरित सब मनुष्यों के कल्याणार्थ उपदेष्टा हो। अर्थात् जितने पृथिवी से लेके परमेष्वर पय्र्यन्त पदार्थो का ज्ञान प्राप्त होकर उपदेष्टा होता है, जो ऐसे पुरूष और पूर्ण आप्त परमेष्वर के उपदेष वेद हैं, उन्हीं को ‘शब्दप्रमाण’ जानो।
न चतुष्ट्वमैतिह्यार्थापत्तिसम्भवाभावप्रामाण्यात्।।
जो इति ह अर्थात् इस प्रकार का था, उसने इस प्रकार किया। अर्थात् किसी के जीवन-चरित्र का नाम ‘ऐतिह्य’ है।
    छठा अर्थापत्ति-
    जैसे किसी ने किसी से कहा कि ‘‘बदल के होने से वर्षा और कारण के होने से काय्र्य उत्पन्न होता है’’। इससे, विना कहे यह दूसरी बात सिद्ध होती है कि ‘‘विना बदल वर्षा और विना कारण काय्र्य कभी नहीं हो सकता।’’
    सातवाँ सम्भव-
    ‘सम्भवति यस्मिन् स सम्भवः’  कोई कहे कि ‘‘माता-पिता के सड़ग के विना सन्तानोत्पत्ति, किसी ने मृतक जिलाये, पहाड़ उठाये, समुद्र में पत्थर तराये, चन्द्रमा के टुकड़े किये, परमेष्वर का अवतार हुआ, मनुष्य के सींग देखे और वन्ध्या के पुत्र और पुत्री का विवाह किया’’ इत्यादि सब असम्भव हैं। क्योंकि ये सब बात सृष्टिक्रम के विरूद्ध हैं। और जो बात सृष्टिक्रम के अनुकूल हो, वहीं ‘सम्भव’ है।
    आठवाँ अभाव-
    ‘न भवति यस्मिन् सोऽभावः’ जैसे किसी ने किसी से कहा कि ‘‘ हाथी ले आ’’ उसने वहाँ हाथी का अभाव देखकर, जहाँ हाथी था, वहाँ से ले आया। सब प्रकर की हस्तक्रिया, यन्त्रकला आदि को सीखें, परन्तु जितने ग्रह, नक्षत्र, जन्मपत्र, राषि, मुहूर्त आदि के फल के विधायक ग्रन्थ हैं, उनको झूठ समझके कभी न पढ़े और न पढ़ावें।
    जितनी विद्या से बीस वा इक्कीस वर्षो में हो सकती है, उतनी अन्य प्रकार से शतवर्ष में भी नहीं हो सकती।
    ऋषिप्रणीत ग्रन्थों को इसलिए पढ़ना चाहिए कि वे बड़े विद्वान, सर्वषास्त्रवित् और धर्मात्मा थे और अनृषि अर्थात् जो अल्प शास्त्र पढ़े हैं और जिनका आत्मा पक्षपातसहित है, उनके बनाये हुए ग्रन्थ भी वैसे ही हैं।
प्रश्न-क्या इन ग्रन्थों में कुछ भी सत्य नहीं?
उत्तर-थोड़ा सत्य तो है, परन्तु इसके साथ बहुत-सा असत्य भी है। इससे ‘विषसम्पृक्तात्रवत् त्याज्याः’ जैसे अत्युत्तम अन्न विष से युक्त होने से, छोड़ने योग्य होता है, वैसे ये ग्रन्थ हैं।
प्रष्न-क्या आप पुराण, इतिहास को नहीं मानते?
उत्तर-हाँ मानते हैं, परन्तु सत्य को मानते हैं, मिथ्या को नहीं।
प्रष्न-कौन सत्य और कौन मिथ्या है?
उत्तर-ब्राह्यणानीतिहासान् पुराणानि कल्पान् गाथा नाराषंसीरिति।।
जो ऐतरेय, शतपथादि ब्राह्यण लिख आये उन्हीं के इतिहास, पुराण, कल्प, गाथा और नाराषंसी पाँच नाम हैं, श्रीमद्धागवतादि का नाम पुराण नहीं।
प्रष्न-जो त्याज्य ग्रन्थों में सत्य है, उसका ग्रहण क्यों नहीं करते?
उत्तर-जो-जो उनमें सत्य है, सो-सो वेदादि सत्य शास्त्रों का है और मिथ्या उनके घर का है। वेदादि सत्य शास्त्रों के स्वीकार में सब सत्य का ग्रहण हो जाता है। जो कोई इन मिथ्या ग्रन्थों से सत्य का ग्रहण करना चाहे, तो मिथ्या भी उनके गले लिपट जाए। इसलिए ‘असत्यमिश्रं सत्यं दूरतस्त्याज्यमिति’ असत्य से युक्त ग्रन्थस्थ सत्य को भी वैसे छोड़ देना चाहिए जैसे विषयुक्त अन्न को।
प्रष्न- जैसा सत्यासत्य और एक -दूसरे ग्रन्थों का परस्पर विरोध है, वैसे अन्य शास्त्रों में भी है। जैसा सृष्टिविषय में छः शास्त्रों का विरोध है-मीमांसा कर्म, वैशेषिक काल, न्याय परमाणु, योग पुरूषार्थ, सांख्म प्रकृति और वेदान्तशास्त्र ब्रह्य से सृष्टि की उत्पत्ति मानता है, क्या यह विरोध नहीं है?
उत्तर- नहीं, प्रथम तो विना सांख्य और वेदान्त के, दूसरे चार शास्त्रों में सृष्टि की उत्पत्ति प्रसिद्ध नहीं लिखी और इनमें विरोध भी नहीं, क्योंकि तुमको विरोधाविरोध का ज्ञान नहीं। मैं तुमसे पूछता हूँ कि विरोध किस स्थल में होता है? क्या एक विषय में अथवा भिन्न-भिन्न विषयों में?
प्रष्न-एक विषय में अनेकों का परस्पर विरूद्ध कथन हो, उसको विरोध कहते हैं। यहाँ भी सृष्टि एक ही विषय है।
उत्तर-क्या विद्या एक है वा दो? एक है। जो एक है, तो व्याकरण, वैद्यक, ज्योतिष आदि का भिन्न-भिन्न विषय क्यों है? जैसा एक विद्या में अनेक विद्या के अवयवों का, एक-दूसरे से भिन्न प्रतिपादन होता है, वैसे ही सृष्टिविद्या के भिन्न-भिन्न छः अवयवों का छः शास्त्रों में प्रतिपादन करने से इनमें कुछ भी विरोध नहीं।
    जो विद्या पढ़ने-पढाने के विघ्र हैं, उनको छोड़ देवें। जैसा कुसड़ग अर्थात् दुष्ट विषयी जनों का संग, दुष्टव्यसन जैसा मद्यादि सेवन और वेश्यागमनादि, बाल्यावस्था में विवाह अर्थात् पच्चीस वर्षो से पूर्व पुरूष और सोहलवें वर्ष से पूर्व स्त्री का विवाह हो जाना, पूर्ण ब्रह्यचर्य न होना, राजा, माता, पिता और विद्वानों का प्रेम वेदादि शास्त्रों के प्रचार में न होना, अतिभोजन, अति जागरण करना, पढ़ने-पढ़ाने, परीक्षा लेने वा देने में आलस्य वा कपट करना, सर्वोपरि विद्या का लाभ न समझना, ब्रह्यचर्य से वीर्य बल, बुद्धि, पराक्रम, आरोग्य, राज्य, धन की वृद्धि न मानना, ईष्वर का ध्यान छोड़ अन्य पाषाणादि जड़ मूर्ति के दर्शन-पूजन में व्यर्थ काल खोना, माता, पिता, अतिथि और आचार्य, विद्वान् इन सत्यूत्तिमानों की सेवा और सत्संग न करना, वर्णाश्रम के धर्म को छोड़ ऊध्र्वपुण्ड्र, तिलक, कंठी, मालाधारण, एकादषी, त्रयोदषी,  आदि व्रत करना, काष्यादि तीर्थ और राम, कृष्ण, नारायण, षिव, भगवती, गणेषादि के नामस्मरण से पाप दूर होने का विष्वास, पाखण्डियों के उपदेष से विद्या पढ़ने में अश्रद्धा का होना, विद्या, धर्म, योग, परमेष्वर की उपासना के विना, मिथ्या पुराणनामक भागवतादि की कथादि से मुक्ति का मानना, लोभ से धनादि में प्रवृत्ति होकर विद्या में प्रीति न रखना, इधर-उधर व्यर्थ घूमते रहना इत्यादि मिथ्या व्यवहारों में फसके ब्रह्यचर्य और विद्या के लाभ से रहित होकर रोगी और मूर्ख बने रहते हैं।
प्रष्न- क्या स्त्री और शूद्र भी वेद पढ़े? जो ये पढेंगे तो हम फिर क्या करेंगे? और इनके पढ़ने में प्रमाण भी नहीं है, जैसा यह निषेध है-
उत्तर-सब स्त्री और पुरूष अर्थात् मनुष्यमात्र को पढ़ने का अधिकार है। और तुम कुआ में पड़ो। और यह श्रुति तुम्हारी कपोलकल्पता से हुई है। किसी प्रामाणिक ग्रन्थ की नहीं। और सब मनुष्यों के वेदादि पढ़ने-सुनने के अधिकार का प्रमाण यजुर्वेद के छब्बीसवें अध्याय में दूसरा मन्त्र है।
    वेदों का निन्दक और न माननेवाला नास्तिक कहाता है। क्या परमेष्वर शूद्रों का भला करना नहीं चाहता? क्या ईष्वर पक्षपाती है कि वेदों के पढ़ने-सुनने का शूद्रों के लिए निषेध और द्विजों के लिए विधि करे? जो परमेष्वर का अभिप्राय शूद्रादि के पढ़ाने-सुनाने का न होता, तो इनके शरीर में वाक् और श्रोत्र-इन्द्रिय क्यों रचता? जैसे परमात्मा ने पृथिवी, जल, अग्रि, वायु, चन्द्र, सूर्य और अन्नादि पदार्थ सबके लिए बनाये हैं, वैसे ही वेद भी सबके लिए प्रकाशित किये हैं। 

 

Monday, 1 August 2016


                                                      VANS NEWS FAINCHARI MATHURA

Saturday, 30 January 2016

VILLAGE FAINCHARI DISTT. MATHURA REPUBLIC DAY 2016 PICTURE





                       VILLAGE FAINCHARI DISTT. MATHURA REPUBLIC DAY 2016 PICTURE